उत्तर प्रदेशबस्ती

चार करोड़ का ‘शमशान’ बना शराब का अड्डा: सात साल बाद भी नहीं हुआ एक अंतिम संस्कार

अमहट घाट का 'आधुनिक' शर्मनाक सच: मोक्ष के नाम पर बनी इमारत अब बन गई अवैध मैखाना; सरकारी धन की खुली लूट: अमहट घाट पर आधुनिक श्मशान नहीं, फल-फूल रहा है शराब का अवैध कारोबार

अजीत मिश्रा (खोजी)

अमहट घाट: ‘मोक्ष’ की जगह ‘मैखाना’, चार करोड़ की बर्बादी का शर्मनाक सच

  • बस्ती: चार करोड़ की लागत, सात साल की बर्बादी; अब अंत्येष्टि स्थल को ‘पार्क’ बनाने का खेल
  • अमहट घाट की दुर्दशा: खंडहर बनी चार करोड़ की योजना, कब होगी जिम्मेदारी तय?
  • जब ‘मोक्ष’ की जगह ‘मदिरा’ का बसेरा हो: अमहट घाट के आधुनिक अंत्येष्टि स्थल की सच्चाई

बस्ती। सरकारें आती हैं, दावे किए जाते हैं, और जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से करोड़ों की योजनाएं कागजों और पत्थरों पर उकेर दी जाती हैं। लेकिन क्या उन योजनाओं का हश्र भी बस्ती के अमहट घाट स्थित ‘आधुनिक अंत्येष्टि स्थल’ जैसा होना चाहिए? सात साल पहले, 2019 में तत्कालीन नगर विकास मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने बड़े तामझाम के साथ जिस ‘आधुनिक’ श्मशान घाट का उद्घाटन किया था, आज वह विकास के नाम पर सरकारी धन की बर्बादी का जीता-जागता स्मारक बन चुका है।IMG 20260708 130809

​चार करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि पानी की तरह बहा दी गई, लेकिन हकीकत यह है कि इन सात वर्षों में यहाँ एक भी अंतिम संस्कार नहीं हुआ। ऐसा क्यों? क्योंकि व्यवस्था बनाने वालों ने शायद यह नहीं सोचा कि ‘आधुनिक’ होने का मतलब परंपराओं को कुचलना नहीं है। शहर के लोग आज भी अपनी पुरानी मान्यताओं के अनुसार अमहट के पुराने मड़घाट पर ही जाना उचित समझते हैं। नतीजा? करोड़ों की यह संपत्ति आज खंडहर में तब्दील हो रही है—इंटरलॉकिंग धंस चुकी है, दीवारें टूट रही हैं और झाड़ियों ने इसे वीरान बना दिया है।

​मगर विडंबना देखिए, यह अंत्येष्टि स्थल केवल वीरान ही नहीं है, बल्कि अब यह एक और बड़े घोटाले का केंद्र बन गया है। खबर है कि इस सरकारी परिसर की आड़ में अब अवैध अंग्रेजी और देशी शराब की दुकानें धड़ल्ले से संचालित हो रही हैं। जिस स्थान पर लोगों को मोक्ष की शांति मिलनी चाहिए थी, आज वहाँ शराब की बोतलों का अंबार और नशे का कारोबार पनप रहा है। क्या प्रशासन की नाक के नीचे यह सब कुछ अनजाने में हो रहा है? या फिर इस बर्बादी के पीछे किसी की गहरी मिलीभगत है?

​नगर पालिका अध्यक्ष नेहा वर्मा कहती हैं कि अब इसे ‘पार्क’ बनाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। वाह! पहले श्मशान बनाया, अब पार्क? कल क्या इसे फिर से कुछ और बदल दिया जाएगा? यह प्रस्ताव विकास की दूरदर्शिता नहीं, बल्कि अपनी गलतियों को छिपाने की एक और कोशिश मालूम पड़ती है।

​स्थानीय नागरिक सही कहते हैं—सरकारी योजनाएं जनता की जरूरत और उनकी परंपराओं के अनुकूल होनी चाहिए। बिना सोचे-समझे बनाई गई ये योजनाएं न केवल जनता के पैसे का अपमान हैं, बल्कि शहर के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी हैं। अमहट घाट का यह ‘आधुनिक’ कचराघर आज प्रशासन की कार्यशैली पर एक बड़ा सवालिया निशान है। क्या इस करोड़ों की बर्बादी और वहां चल रहे अवैध शराब के कारोबार पर कोई कार्रवाई होगी? या फिर बस्ती की जनता इसी तरह सरकारी विफलता के खंडहरों को देखती रहेगी?

​समय आ गया है कि जवाबदेही तय हो। क्योंकि अगर अब भी कदम नहीं उठाए गए, तो वह दिन दूर नहीं जब यह परिसर पूरी तरह जमींदोज हो जाएगा, और उसके साथ ही नष्ट हो जाएगा जनता का भरोसे का आखिरी टुकड़ा।

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